निर्णय लेने या न्याय करने की क्षमता हम मनुष्यों का सबसे बड़ा गुण है। किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़ा हो जाना हमें नायक और खलनायक की श्रेणी में विभाजित तो करता है परन्तु दोनों ही स्थितिओ में निर्णय लेने की योग्यता और साहस होनी चाहिए । ये एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे कायर नहीं कर सकते। कायर तथष्ट रहना चाहते हैं। इनके निर्णय बाह्य कारणों से ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस मामले में हम कायरो की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। ऐसा क्या हो गया की हमने जूलियन असान्जे को शरण देने से मना कर दिया ? और इक्वाडोर जैसा छोटा देश शरण देने को तैयार हो गया ? बाह्य दबाव ? लाभ हानि की चिंता ? शर्मनाक स्थिति है। याद रखिये, जब पूरी दुनिया ने यहुदियो को शरण देने से मना कर दिया था तो भारत ने यहुदियो को शरण दिया। दक्षिण भारत के चेन्नई में आज भी इनके घर और पूजास्थल इस बात के गवाह हैं। इस्राएल बन्ने के बाद ये वहा से चले गए परन्तु आज भी इनके ह्रदय में भारत के लिए एक मातृभूमि जैसा सम्मान हैं। शरण देते समय राजा ने किसी बाह्य या आतंरिक दबाव की चिंता नहीं की। लाभ हानि की चिंता नहीं की बल्कि अंतरात्मा रूपी न्यायधीश की बात सुनी। मानवीय रिश्तो और मूल्यों की चिंता की। उस समय तो हिन्दू राजाओं द्वारा तानाशाही थी पर यहुदियो को शरण दी गयी। आज हम प्रभुत्वासम्पन्न हैं पर असान्जे को शरण नहीं दिया। आज हम धर्मनिरपेक्ष हैं पर हमने सलमान रुश्दी को शरण नहीं दी। आज हम प्रजातान्त्रिक हैं पर हमने तसलीमा नसरीन को शरण देने से मना कर दिया। लाभ हानि के समीकरण ना बिगड़ जाए इसलिए अतिथि देवो भवः का धर्म त्याग दिया। देखते है कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा आगे कब तक जारी रहती है।
तथाकथित विकास की सरपट भागती जिंदगी में हर क्षण कुछ न कुछ नया होता है परिभाषाएं बदलती है संस्कृति नविन चेहरा अख्तियार करती है समाज का ताना बाना रिश्तो की बदलती नियति से स्पंदित होता है ऐसे में कुछ नए विचार और अभिव्यक्तियाँ फूल की तरह खिलते है और मुरझा जाते है पर किसी को इसकी खबर तक नहीं होती...ये सार्थक उदगार है किसी के पसंद नापसंद की फिक्र किये बिना क्योंकि - असहमति का साहस और सहमति का विवेक ही मनुष्य को पशु की श्रेणी से अलग करता है- जय हिंद !
Sunday, October 20, 2013
कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा
निर्णय लेने या न्याय करने की क्षमता हम मनुष्यों का सबसे बड़ा गुण है। किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़ा हो जाना हमें नायक और खलनायक की श्रेणी में विभाजित तो करता है परन्तु दोनों ही स्थितिओ में निर्णय लेने की योग्यता और साहस होनी चाहिए । ये एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे कायर नहीं कर सकते। कायर तथष्ट रहना चाहते हैं। इनके निर्णय बाह्य कारणों से ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस मामले में हम कायरो की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। ऐसा क्या हो गया की हमने जूलियन असान्जे को शरण देने से मना कर दिया ? और इक्वाडोर जैसा छोटा देश शरण देने को तैयार हो गया ? बाह्य दबाव ? लाभ हानि की चिंता ? शर्मनाक स्थिति है। याद रखिये, जब पूरी दुनिया ने यहुदियो को शरण देने से मना कर दिया था तो भारत ने यहुदियो को शरण दिया। दक्षिण भारत के चेन्नई में आज भी इनके घर और पूजास्थल इस बात के गवाह हैं। इस्राएल बन्ने के बाद ये वहा से चले गए परन्तु आज भी इनके ह्रदय में भारत के लिए एक मातृभूमि जैसा सम्मान हैं। शरण देते समय राजा ने किसी बाह्य या आतंरिक दबाव की चिंता नहीं की। लाभ हानि की चिंता नहीं की बल्कि अंतरात्मा रूपी न्यायधीश की बात सुनी। मानवीय रिश्तो और मूल्यों की चिंता की। उस समय तो हिन्दू राजाओं द्वारा तानाशाही थी पर यहुदियो को शरण दी गयी। आज हम प्रभुत्वासम्पन्न हैं पर असान्जे को शरण नहीं दिया। आज हम धर्मनिरपेक्ष हैं पर हमने सलमान रुश्दी को शरण नहीं दी। आज हम प्रजातान्त्रिक हैं पर हमने तसलीमा नसरीन को शरण देने से मना कर दिया। लाभ हानि के समीकरण ना बिगड़ जाए इसलिए अतिथि देवो भवः का धर्म त्याग दिया। देखते है कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा आगे कब तक जारी रहती है।
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