परिवर्तन की बयार बह रही है. गणतंत्र दिवस आने को है. ऐसे में आइये एक ऐसे गाँव से परिचय करवाऊं जिसे इस मुल्क का सबसे देशभक्त गाँव कहा जाता है. विडिओ का लिंक निचे है. JAI HIND
उदगार
तथाकथित विकास की सरपट भागती जिंदगी में हर क्षण कुछ न कुछ नया होता है परिभाषाएं बदलती है संस्कृति नविन चेहरा अख्तियार करती है समाज का ताना बाना रिश्तो की बदलती नियति से स्पंदित होता है ऐसे में कुछ नए विचार और अभिव्यक्तियाँ फूल की तरह खिलते है और मुरझा जाते है पर किसी को इसकी खबर तक नहीं होती...ये सार्थक उदगार है किसी के पसंद नापसंद की फिक्र किये बिना क्योंकि - असहमति का साहस और सहमति का विवेक ही मनुष्य को पशु की श्रेणी से अलग करता है- जय हिंद !
Sunday, January 21, 2018
Thursday, April 23, 2015
देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं
मेरे मुताबिक दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो खर्च करते हैं देते हैं बाटते हैं दूसरा वो जो संचित करते हैं लेते हैं बचाते हैं. संचित करने वाले सुरक्षा की ओर अग्रसर रहते हैं बांटने वाले गतिशीलता की ओर. संचय हमें कमजोर करता है आत्मविश्वास को डिगा देता है, बांटना या देना हमें संघर्षशील बनाता है रचनात्मक बनाता है. दुर्योधन ने देने या बांटने के कृत्य से दानवीर कर्ण की मित्रता प्राप्त की, बचाने या संचित करने के चक्कर सब कुछ गंवा बैठा। इसलिए जीवन में देना सीखिये लेना नहीं। और याद रखिये, देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं।
Wednesday, April 22, 2015
कुछ गैर जरुरी सवाल
अस्पताल के कैंसर वार्ड में मौत का इन्तेजार करते लोगो से पूछिये की भाजपा अच्छी पार्टी है या कांग्रेस ? डायलिसिस मशीन के सहारे जिन्दा किडनी मरीजों से पूछिये की हिन्दू धर्म अच्छा है या इस्लाम या क्रिश्चियन ? कर्ज के बोझ से दबे जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उनके बच्चो से पूछिये की भारत की संस्कृति अच्छी है या पश्चिमी ? स्वाइन फ्लू और डेंगू जैसी बिमारिओ से मरने वाले गरीबो के परिवार से पूछिये की कश्मीर भारत का है या पाकिस्तान का ? कूड़ा चुनने वाले अनाथ बच्चो से पूछिए की देश सुपर पावर बनेगा या नहीं ? ये चंद सवाल हैं जो आपकी खोखली मानसिकता को रद्दी की टोकरी में डालने के लिए काफी हैं
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सबसे लम्बे किसिंग सीन के मायने
हिंदी फिल्मो के बारे में कुछ मालूमात हासिल करने की कवायद में चंद उम्दा जानकारिओ से रूबरू हुआ. सोचा एक दिलचस्प बात आपको भी इत्तला की जाएँ, शेयर की जाएँ। हम जब ड्रीम गर्ल की बात करते हैं तो जेहन में दिलकश अदाकारा हेमा मालिनी की तस्वीर उभर आती है. पर ये दीगर मामला है और शायद कम लोगो को ये इल्म है की हिंदी फिल्मो की पहली ड्रीम गर्ल देविका रानी थी. जहाँ आज के आधुनिक और परिपक्व दर्शक भी लिप लॉक या स्मूच सीन को सहजता से नहीं ले पाते तो जरा सोचिये की 1933 में, जी हाँ आजादी से पहले प्रदर्शित अंग्रेजी फिल्म ‘कर्म’ में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक लिप टू लिप दृश्य देकर दर्शको का कैसा हाल किया होगा ? ये आज भी बॉलीवुड के सबसे लम्बे किसिंग सीन की फेहरिस्त में अव्वल दर्जे पर है. देविका रानी के साथ हिमांशु राय ने शादी कर ली, शादी के बाद हिमांशु ने साल 1934 में बॉम्बे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इस बैनर तले बनी पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ में देविका रानी की अदाओ से घायल दर्शको ने इन्हे पहली स्वप्न सुंदरी ड्रीम गर्ल का दर्जा दे दिया। देविका आज के उन फिल्म निर्माताओं के मुह पर तमाचा भी जड़ती हैं जो समझते हैं की पुरानी फिल्म इंडस्ट्री के लोग modern and progressive नहीं थे. बेसिरपैर के आइटम सांग, बेड सीन, किस सीन etc ठूस कर modernism का शो ऑफ करने वाले निर्देशकों तुम आज भी 80 साल पीछे हो.
पाकीज़ा की दीगर शख्सियत
जिंदगी से बेज़ारी, दर्द से मोहब्बत, घुटन भरे अल्फाज, नाजुक अंदाज! ट्रैजिक क्वीन मीना कुमारी उर्फ़ महजबीं बानो की शख्सियत को ऐसे स्टीरिओटाइप चंद लाइनो में ही नहीं समेटा जा सकता। ये हकीकत है की उनके कंपकपाते होठो पर तैरती मुस्कान के पीछे रहस्यमयी दर्द भरी कहानियाँ है पर मीना कुमारी का व्यक्तित्व कुछ और भी है. मीना जी को कहानियां सुनने का बड़ा शौक था परियों की, दूर देश के राजा की. एक बार तो इन्होने ये कह दिया की इन्हे मौत बहुत पसंद है क्योंकि मौत की चुप्पी हर बीतते लम्हे में एक दिलचस्प कहानी सुनाया करती है. इन्हे बासी रोटी बहुत पसंद थी, नहीं मिलने पर रोने लग जाती थीं. डायरी लिखने का ऐसा शौक की पर्स में हमेशा डायरी रखती, कहतीं "कोई बात जेहन में आ जाती है तो उसको डायरी में कह देती हूँ बाद में सोच के लिखूंगी तो उस में बनावट आ जायेगी। जो मैं एक्टिंग करती हूँ वह ख्याल किसी और का है स्क्रिप्ट किसी और कि और डायरेक्शन किसी और का. इस में मेरा अपना कुछ भी नही. दरअसल मैं तो वो हूँ जो इस डायरी में लिखा है" गुलजार साहब ने मीना जी के लिए ये पंक्तियाँ लिखी "शहतूत की डाल पर बैठी मीना बुनती रेशम के धागे .. रेशम की यह कैदी शायद एक दिन अपने ही धागों में घुट कर मर जायेगी" और ऐसा हुआ भी ! दुनिया को अलविदा कहने से पहले मीना कुमारी ने अपनी डायरी कमाल अमरोही या धर्मेन्द्र को नहीं बल्कि गुलजार को गिफ्ट कर दी. गुलजार को ही क्यों ? जाते जाते भी लीजेंडरी एक्ट्रेस इक रहस्य छोड़ गयीं.
कादंबरी का आध्यात्मिक प्रेम और नासमझ समाज
कादंबरी ! साहित्य और फिल्मो में रूचि रखने वाले इस नाम से इत्तेफाक रखते होंगे। कादंबरी गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की भाभी थीं. इन्होने टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण किया था उनकी प्रारंभिक गुरु थीं. दोनों के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. एक ऐसा प्रेम जिसे जिस्मानी रिश्तो की पहचान करने वाला माँसल समाज नहीं परख सकता। कादंबरी निःसंतान थी. जाहिर तौर पे दोनों के बीच करीबी रिश्ते और भावनात्मक तादाम्य को गलत समझा गया. इतना गलत की कोफ़्त होकर कादंबरी ने आत्महत्या कर ली. गुरुदेव ने कादंबरी के ऊपर काल्पनिक उपन्यास 'नस्तनीड़' लिखी। सत्यजित रे ने इस पर आधारित फिल्म 'चारुलता' और बंधना मुखोपाध्याय ने 'चिरोशाखे' बनाकर कादंबरी के माथे पर लगे कलंक को हटाने की कोशिश तो की पर समाज की मानसिकता बदली क्या ?अपनी खोखली मान प्रतिष्ठा और नासमझी की वजह से ये समाज बहुत पहले से ही निर्दोषो का गला घोंटता रहा है. आज भी कितने ही घरो में कादंबरी रोज कलंकित होती है रोज मरती है. चुपके से. ना जाने हम रिश्तो को समझना कब सीखेंगे.
Sunday, October 20, 2013
'वाद' और 'पंथ' का दौर
'वाद' और 'पंथ' का दौर है। ये उत्तर आधुनिकता का युग है जिसमे 'निष्पक्षता' विधवा के श्रृंगार की तरह अछूत माना जाता है। धारण कर लिया तो लोग नाक भौ सिकोरेंगे आलोचना होगी प्रसंशा नहीं । अपनी सामाजिक स्थिति अखंडित रखने के लिए किसी 'वाद' या 'पंथ' के शरण में जाना अनिवार्य हो गया है। अब अगर आप मजदूरो की हित की सोच रहे हैं या मौजूदा सरकार की आलोचना कर रहे हैं तो लोग कहेंगे "तुम वामपंथी हो का ?" प्रजातंत्र के हिमायती है और सरकार की प्रशंशा कर रहे हो तो लोग कहेंगे "दक्षिणपंथी हो का ?" धर्म की बातें करे तो कहते हैं "सांप्रदायिक हो का ?" किसी राज्य के बारे में बात करे तो "क्षेत्रवादी हो का ?" देश भक्ति की बात करे तो "राष्ट्रवादी हो का ?" किसी भाषा की प्रशंशा करे तो "भाषावादी हो का ?" अमेरिका की प्रशंशा कर दो तो "साम्राज्यवादी हो का ?" इस्लाम की प्रशंशा कर दो तो "जिहादी हो का " स्त्रिओ के अधिकार की बात कर दो तो "स्त्रीवादी हो का ? " शोषित पुरुषो की बात कर लो तो "पितृ सत्तावादी हो का ?" संस्कार संस्कृति के क्षरण पर चिंतित दिख गए तो "परम्परावादी हो का ?" फेहरिश्त लम्बी है महाशय और बौद्धिकता के हर चरण के साथ इसका आयाम भी हनुमान की पूंछ की तरह दीर्घ होता जा रहा है। समाज 'कृत्य प्रधान' की जगह 'कारक प्रधान' हो गया है। ये चिंता की बात है। सेकुलरवादी साम्प्रदायिको का सर्वनाश चाहते हैं। सांप्रदायिक लोग सेकुलर्वदिओ का अस्तित्व ख़त्म करना चाहते हैं। वाद की जगह वादियो के बिच तलवार खिची है। किसी नास्तिक के मृत्यु पर आस्तिक खुश हो जाते हैं क्योंकि इसका कारण इश्वर में आस्था का नहीं होना है। आस्तिक कारण देख रहे हैं कृत्य नहीं। जबकि मानवीय आधार पर यहाँ मृत्यु पर शोक व्यक्त होना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा। ये 'वाद' और 'पंथ' का घृणित रोग मानवीय रिश्तो को सड़ा रहा है। वर्गो में विभाजित कर रहा है। हम फिर से बट रहे हैं। इतिहास साक्षी है समाज बटता है तो फिर पतन की ओर जाता है विकास की और नहीं। ये नियम प्राकृतिक हैं।
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