कादंबरी ! साहित्य और फिल्मो में रूचि रखने वाले इस नाम से इत्तेफाक रखते होंगे। कादंबरी गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की भाभी थीं. इन्होने टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण किया था उनकी प्रारंभिक गुरु थीं. दोनों के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. एक ऐसा प्रेम जिसे जिस्मानी रिश्तो की पहचान करने वाला माँसल समाज नहीं परख सकता। कादंबरी निःसंतान थी. जाहिर तौर पे दोनों के बीच करीबी रिश्ते और भावनात्मक तादाम्य को गलत समझा गया. इतना गलत की कोफ़्त होकर कादंबरी ने आत्महत्या कर ली. गुरुदेव ने कादंबरी के ऊपर काल्पनिक उपन्यास 'नस्तनीड़' लिखी। सत्यजित रे ने इस पर आधारित फिल्म 'चारुलता' और बंधना मुखोपाध्याय ने 'चिरोशाखे' बनाकर कादंबरी के माथे पर लगे कलंक को हटाने की कोशिश तो की पर समाज की मानसिकता बदली क्या ?अपनी खोखली मान प्रतिष्ठा और नासमझी की वजह से ये समाज बहुत पहले से ही निर्दोषो का गला घोंटता रहा है. आज भी कितने ही घरो में कादंबरी रोज कलंकित होती है रोज मरती है. चुपके से. ना जाने हम रिश्तो को समझना कब सीखेंगे.
तथाकथित विकास की सरपट भागती जिंदगी में हर क्षण कुछ न कुछ नया होता है परिभाषाएं बदलती है संस्कृति नविन चेहरा अख्तियार करती है समाज का ताना बाना रिश्तो की बदलती नियति से स्पंदित होता है ऐसे में कुछ नए विचार और अभिव्यक्तियाँ फूल की तरह खिलते है और मुरझा जाते है पर किसी को इसकी खबर तक नहीं होती...ये सार्थक उदगार है किसी के पसंद नापसंद की फिक्र किये बिना क्योंकि - असहमति का साहस और सहमति का विवेक ही मनुष्य को पशु की श्रेणी से अलग करता है- जय हिंद !
Wednesday, April 22, 2015
कादंबरी का आध्यात्मिक प्रेम और नासमझ समाज
कादंबरी ! साहित्य और फिल्मो में रूचि रखने वाले इस नाम से इत्तेफाक रखते होंगे। कादंबरी गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की भाभी थीं. इन्होने टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण किया था उनकी प्रारंभिक गुरु थीं. दोनों के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. एक ऐसा प्रेम जिसे जिस्मानी रिश्तो की पहचान करने वाला माँसल समाज नहीं परख सकता। कादंबरी निःसंतान थी. जाहिर तौर पे दोनों के बीच करीबी रिश्ते और भावनात्मक तादाम्य को गलत समझा गया. इतना गलत की कोफ़्त होकर कादंबरी ने आत्महत्या कर ली. गुरुदेव ने कादंबरी के ऊपर काल्पनिक उपन्यास 'नस्तनीड़' लिखी। सत्यजित रे ने इस पर आधारित फिल्म 'चारुलता' और बंधना मुखोपाध्याय ने 'चिरोशाखे' बनाकर कादंबरी के माथे पर लगे कलंक को हटाने की कोशिश तो की पर समाज की मानसिकता बदली क्या ?अपनी खोखली मान प्रतिष्ठा और नासमझी की वजह से ये समाज बहुत पहले से ही निर्दोषो का गला घोंटता रहा है. आज भी कितने ही घरो में कादंबरी रोज कलंकित होती है रोज मरती है. चुपके से. ना जाने हम रिश्तो को समझना कब सीखेंगे.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment