मेरे मुताबिक दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो खर्च करते हैं देते हैं बाटते हैं दूसरा वो जो संचित करते हैं लेते हैं बचाते हैं. संचित करने वाले सुरक्षा की ओर अग्रसर रहते हैं बांटने वाले गतिशीलता की ओर. संचय हमें कमजोर करता है आत्मविश्वास को डिगा देता है, बांटना या देना हमें संघर्षशील बनाता है रचनात्मक बनाता है. दुर्योधन ने देने या बांटने के कृत्य से दानवीर कर्ण की मित्रता प्राप्त की, बचाने या संचित करने के चक्कर सब कुछ गंवा बैठा। इसलिए जीवन में देना सीखिये लेना नहीं। और याद रखिये, देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं।

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