Sunday, January 21, 2018





परिवर्तन की बयार बह रही है. गणतंत्र दिवस आने को है. ऐसे में आइये एक ऐसे गाँव से परिचय करवाऊं जिसे इस मुल्क का सबसे देशभक्त गाँव कहा जाता है. विडिओ का लिंक निचे है. JAI HIND


Thursday, April 23, 2015

देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं

मेरे मुताबिक दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो खर्च करते हैं देते हैं बाटते हैं दूसरा वो जो संचित करते हैं लेते हैं बचाते हैं. संचित करने वाले सुरक्षा की ओर अग्रसर रहते हैं बांटने वाले गतिशीलता की ओर. संचय हमें कमजोर करता है आत्मविश्वास को डिगा देता है, बांटना या देना हमें संघर्षशील बनाता है रचनात्मक बनाता है. दुर्योधन ने  देने या बांटने के कृत्य से दानवीर कर्ण की मित्रता प्राप्त की, बचाने या संचित करने के चक्कर सब कुछ गंवा बैठा।  इसलिए जीवन में देना सीखिये लेना नहीं। और याद रखिये,  देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं।

Wednesday, April 22, 2015

कुछ गैर जरुरी सवाल

अस्पताल के कैंसर वार्ड में मौत का इन्तेजार करते लोगो से पूछिये की भाजपा अच्छी पार्टी है या कांग्रेस ? डायलिसिस मशीन के सहारे जिन्दा किडनी मरीजों से पूछिये की हिन्दू धर्म अच्छा है या इस्लाम या क्रिश्चियन ? कर्ज के बोझ से दबे जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उनके बच्चो से पूछिये की भारत की संस्कृति अच्छी है या पश्चिमी ? स्वाइन फ्लू और डेंगू जैसी बिमारिओ से मरने वाले गरीबो के परिवार से पूछिये की कश्मीर भारत का है या पाकिस्तान का ? कूड़ा चुनने वाले अनाथ बच्चो से पूछिए की देश सुपर पावर बनेगा या नहीं ? ये चंद सवाल हैं जो आपकी खोखली मानसिकता को रद्दी की टोकरी में डालने के लिए काफी हैं
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सबसे लम्बे किसिंग सीन के मायने

हिंदी फिल्मो के बारे में कुछ मालूमात हासिल करने की कवायद में चंद उम्दा जानकारिओ से रूबरू हुआ. सोचा एक दिलचस्प बात आपको भी इत्तला की जाएँ, शेयर की जाएँ। हम जब ड्रीम गर्ल की बात करते हैं तो जेहन में दिलकश अदाकारा हेमा मालिनी की तस्वीर उभर आती है. पर ये दीगर मामला है और शायद कम लोगो को ये इल्म है की हिंदी फिल्मो की पहली ड्रीम गर्ल देविका रानी थी. जहाँ आज के आधुनिक और परिपक्व दर्शक भी लिप लॉक या स्मूच सीन को सहजता से नहीं ले पाते तो जरा सोचिये की 1933 में, जी हाँ आजादी से पहले प्रदर्शित अंग्रेजी फिल्म ‘कर्म’ में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक लिप टू लिप दृश्य देकर दर्शको का कैसा हाल किया होगा ? ये आज भी बॉलीवुड के सबसे लम्बे किसिंग सीन की फेहरिस्त में अव्वल दर्जे पर है. देविका रानी के साथ हिमांशु राय ने शादी कर ली, शादी के बाद हिमांशु ने साल 1934 में बॉम्बे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इस बैनर तले बनी पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ में देविका रानी की अदाओ से घायल दर्शको ने इन्हे पहली स्वप्न सुंदरी ड्रीम गर्ल का दर्जा दे दिया। देविका आज के उन फिल्म निर्माताओं के मुह पर तमाचा भी जड़ती हैं जो समझते हैं की पुरानी फिल्म इंडस्ट्री के लोग modern and progressive नहीं थे. बेसिरपैर के आइटम सांग, बेड सीन, किस सीन etc ठूस कर modernism का शो ऑफ करने वाले निर्देशकों तुम आज भी 80 साल पीछे हो.

पाकीज़ा की दीगर शख्सियत

जिंदगी से बेज़ारी, दर्द से मोहब्बत, घुटन भरे अल्फाज, नाजुक अंदाज! ट्रैजिक क्वीन मीना कुमारी उर्फ़ महजबीं बानो की शख्सियत को ऐसे स्टीरिओटाइप चंद लाइनो में ही नहीं समेटा जा सकता। ये हकीकत है की उनके कंपकपाते होठो पर तैरती मुस्कान के पीछे रहस्यमयी दर्द भरी कहानियाँ है पर मीना कुमारी का व्यक्तित्व कुछ और भी है. मीना जी को कहानियां सुनने का बड़ा शौक था परियों की, दूर देश के राजा की. एक बार तो इन्होने ये कह दिया की इन्हे मौत बहुत पसंद है क्योंकि मौत की चुप्पी हर बीतते लम्हे में एक दिलचस्प कहानी सुनाया करती है. इन्हे बासी रोटी बहुत पसंद थी, नहीं मिलने पर रोने लग जाती थीं. डायरी लिखने का ऐसा शौक की पर्स में हमेशा डायरी रखती, कहतीं "कोई बात जेहन में आ जाती है तो उसको डायरी में कह देती हूँ बाद में सोच के लिखूंगी तो उस में बनावट आ जायेगी। जो मैं एक्टिंग करती हूँ वह ख्याल किसी और का है स्क्रिप्ट किसी और कि और डायरेक्शन किसी और का. इस में मेरा अपना कुछ भी नही. दरअसल मैं तो वो हूँ जो इस डायरी में लिखा है" गुलजार साहब ने मीना जी के लिए ये पंक्तियाँ लिखी "शहतूत की डाल पर बैठी मीना बुनती रेशम के धागे .. रेशम की यह कैदी शायद एक दिन अपने ही धागों में घुट कर मर जायेगी" और ऐसा हुआ भी ! दुनिया को अलविदा कहने से पहले मीना कुमारी ने अपनी डायरी कमाल अमरोही या धर्मेन्द्र को नहीं बल्कि गुलजार को गिफ्ट कर दी. गुलजार को ही क्यों ? जाते जाते भी लीजेंडरी एक्ट्रेस इक रहस्य छोड़ गयीं.

कादंबरी का आध्यात्मिक प्रेम और नासमझ समाज




कादंबरी ! साहित्य और फिल्मो में रूचि रखने वाले इस नाम से इत्तेफाक रखते होंगे। कादंबरी गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की भाभी थीं. इन्होने टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण किया था उनकी प्रारंभिक गुरु थीं. दोनों के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. एक ऐसा प्रेम जिसे जिस्मानी रिश्तो की पहचान करने वाला माँसल समाज नहीं परख सकता। कादंबरी निःसंतान थी. जाहिर तौर पे दोनों के बीच करीबी रिश्ते और भावनात्मक तादाम्य को गलत समझा गया. इतना गलत की कोफ़्त होकर कादंबरी ने आत्महत्या कर ली. गुरुदेव ने कादंबरी के ऊपर काल्पनिक उपन्यास 'नस्तनीड़' लिखी। सत्यजित रे ने इस पर आधारित फिल्म 'चारुलता' और बंधना मुखोपाध्याय ने 'चिरोशाखे' बनाकर कादंबरी के माथे पर लगे कलंक को हटाने की कोशिश तो की पर समाज की मानसिकता बदली क्या ?अपनी खोखली मान प्रतिष्ठा और नासमझी की वजह से ये समाज बहुत पहले से ही निर्दोषो का गला घोंटता रहा है. आज भी कितने ही घरो में कादंबरी रोज कलंकित होती है रोज मरती है. चुपके से. ना जाने हम रिश्तो को समझना कब सीखेंगे.

Sunday, October 20, 2013

'वाद' और 'पंथ' का दौर



'वाद' और 'पंथ' का दौर है। ये उत्तर आधुनिकता का युग है जिसमे 'निष्पक्षता' विधवा के श्रृंगार की तरह अछूत माना जाता है। धारण कर लिया तो लोग नाक भौ सिकोरेंगे आलोचना होगी प्रसंशा नहीं । अपनी सामाजिक स्थिति अखंडित रखने के लिए किसी 'वाद' या 'पंथ' के शरण में जाना अनिवार्य हो गया है। अब अगर आप मजदूरो की हित की सोच रहे हैं या मौजूदा सरकार की आलोचना कर रहे हैं तो लोग कहेंगे "तुम वामपंथी हो का ?" प्रजातंत्र के हिमायती है और सरकार की प्रशंशा कर रहे हो तो लोग कहेंगे "दक्षिणपंथी हो का ?" धर्म की बातें करे तो कहते हैं "सांप्रदायिक हो का ?" किसी राज्य के बारे में बात करे तो "क्षेत्रवादी हो का ?" देश भक्ति की बात करे तो "राष्ट्रवादी हो का ?" किसी भाषा की प्रशंशा करे तो "भाषावादी हो का ?" अमेरिका की प्रशंशा कर दो तो "साम्राज्यवादी हो का ?" इस्लाम की प्रशंशा कर दो तो "जिहादी हो का " स्त्रिओ के अधिकार की बात कर दो तो "स्त्रीवादी हो का ? " शोषित पुरुषो की बात कर लो तो "पितृ सत्तावादी हो का ?" संस्कार संस्कृति के क्षरण पर चिंतित दिख गए तो "परम्परावादी हो का ?" फेहरिश्त लम्बी है महाशय और बौद्धिकता के हर चरण के साथ इसका आयाम भी हनुमान की पूंछ की तरह दीर्घ होता जा रहा है। समाज 'कृत्य प्रधान' की जगह 'कारक प्रधान' हो गया है। ये चिंता की बात है। सेकुलरवादी साम्प्रदायिको का सर्वनाश चाहते हैं। सांप्रदायिक लोग सेकुलर्वदिओ का अस्तित्व ख़त्म करना चाहते हैं। वाद की जगह वादियो के बिच तलवार खिची है। किसी नास्तिक के मृत्यु पर आस्तिक खुश हो जाते हैं क्योंकि इसका कारण इश्वर में आस्था का नहीं होना है। आस्तिक कारण देख रहे हैं कृत्य नहीं। जबकि मानवीय आधार पर यहाँ मृत्यु पर शोक व्यक्त होना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा। ये 'वाद' और 'पंथ' का घृणित रोग मानवीय रिश्तो को सड़ा रहा है। वर्गो में विभाजित कर रहा है। हम फिर से बट रहे हैं। इतिहास साक्षी है समाज बटता है तो फिर पतन की ओर जाता है विकास की और नहीं। ये नियम प्राकृतिक हैं।

कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा


 निर्णय लेने या न्याय करने की क्षमता हम मनुष्यों का सबसे बड़ा गुण है।  किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़ा हो जाना हमें नायक और खलनायक की श्रेणी में विभाजित तो करता है परन्तु दोनों ही स्थितिओ में निर्णय लेने की योग्यता और साहस होनी चाहिए । ये एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे कायर नहीं कर सकते। कायर तथष्ट रहना चाहते हैं। इनके निर्णय बाह्य कारणों से  ज्यादा प्रभावित होते हैं।  इस मामले में हम कायरो की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। ऐसा क्या हो गया की हमने जूलियन असान्जे को शरण देने से मना  कर दिया ? और इक्वाडोर जैसा छोटा देश शरण देने को तैयार हो  गया ? बाह्य दबाव ? लाभ हानि की चिंता ? शर्मनाक स्थिति है। याद रखिये, जब  पूरी दुनिया ने यहुदियो को शरण देने से मना कर दिया था तो भारत ने यहुदियो को शरण दिया।  दक्षिण भारत के चेन्नई में आज भी इनके घर और पूजास्थल इस बात के गवाह हैं। इस्राएल बन्ने के बाद ये वहा से चले गए परन्तु आज भी इनके ह्रदय में भारत के लिए एक मातृभूमि जैसा सम्मान हैं। शरण देते समय राजा ने किसी बाह्य या आतंरिक दबाव की चिंता नहीं की। लाभ हानि की चिंता नहीं की बल्कि अंतरात्मा रूपी न्यायधीश की बात सुनी। मानवीय रिश्तो और मूल्यों  की चिंता की। उस समय तो हिन्दू राजाओं द्वारा तानाशाही थी पर यहुदियो को शरण दी गयी। आज हम प्रभुत्वासम्पन्न हैं  पर असान्जे को शरण नहीं दिया।  आज हम  धर्मनिरपेक्ष हैं पर हमने सलमान रुश्दी को शरण नहीं दी। आज हम  प्रजातान्त्रिक हैं पर हमने  तसलीमा नसरीन को शरण देने से मना कर दिया। लाभ हानि के समीकरण ना बिगड़ जाए इसलिए अतिथि देवो भवः  का धर्म त्याग दिया। देखते है कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा आगे कब तक जारी रहती है। 

Tuesday, January 22, 2013



वात्सल्य धर्म से ग्रषित हर माँ 
करती है पुष्ट शिशु की कामना 
आकांक्षा कहे कर्त्तव्य कहे 
दोनों में एक समानता 
गूंजे घर में किलकारी
झूले  आँगन में पालना 
वात्सल्य धर्म से ग्रषित हर माँ 
करती है पुष्ट शिशु की कामना 

माँ का एक विचित्र  रूप 
मैंने देखा पहली बार 
फूटपाथ पर अपंग शिशु सह 
दाता का इंतजार 
हाथ थे टेढ़े 
पाँव अपूर्ण 
प्रकृति का क्रूर प्रहार 
ममता की देवी हाथ फैलाये 
शिशु का निरंतर विलाप 
फटे वस्त्र में लज्जा छुपाये 
याचना बारम्बार 
सभ्य समाज में  क्षुदा तृप्ति
और जीवन का आधार 
महल में  शिशु का भूख में क्रंदन 
करता वात्सल्य अस्तित्व में कम्पन  
फुटपाथ पर 
शिशु का पीड़ा रोदन 
अद्भुत ! माँ का उत्साहवर्धन 
कलियुग है ये  कलियुग है 
माता इसमें तेरा क्या दोष 
पुत्र कर रहा अपने धर्मं का पालन 
कर ले तू संतोष 
- आदित्य कुमार श्रीवास्तव (22/1/13)






Thursday, October 25, 2012


मै हिंदुस्तान हु !
चंद सवालो की जकडन में लगता एक गुलाम हूँ  
आज भी है आजादी की इक्षा 
और कहते है मै महान हु !!
मै हिंदुस्तान हु 

 गौरव की है बात 
देकर दुनिया को सभ्यता की सौगात 
खड़ा हु विश्वमंच पर सारे पिछडो के साथ 
मेरे ज्ञान के बलबूते दुनिया चाँद को छूने जाती है 
आज भी मेरे आंगन में बेटियाँ खरीदी जलाई जाती है 
मैं हिंदुस्तान हु 

गंगा यमुना कृष्णा कावेरी 
नदिया कलकल बहती है 
ह्रदय विदारक मौन दृश्य 
नन्हे  भरत प्यास से मरते है 

अति समृद्ध सशक्तों में थे मेरे वीर शुमार 
शील वीर ने अन्य राष्ट्र पर कभी नहीं किया प्रहार
वीर नहीं नपुंशक हो गर कर जाओ बर्दाश्त 
मेरे हर अंगो पर होता बारम्बार आघात ! बारम्बार अघात ! 
मै हिंदुस्तान हु 

गिनती सिखलाई दुनिया को दिया दशमलव शुन्य का ज्ञान 
मै पीछे ही खड़ा रहा और बाकी बढ़ गए सीना तान 

डॉक्टर इंजिनीअर वैज्ञानिक की फ़ौज बना डाली है 
पर गाँव जहा मै रहता हु वह का ढांचा खाली है  ! 
 
शल्य, योग, आयुर्वेद से विश्व स्वस्थ्य को पता है 
विश्वगुरु के शिशु आज, गैरों की मदद को तरसता हैं 
मै हिंदुस्तान हु !

गर्व करते हो अपने पर हिन्दुस्तानी कहलाते हो 
अपना घर अपना ही वतन त्याग  क्यों कहीं और चले जाते हो ?
उर्वर माटी झील समुन्दर किसकी कमी तुम पाते हो ?
बनके दीपक मुझको त्यज कही और प्रकाश फैलाते हो !

कहते है शीघ्र ही बनूँगा मै सुपरपावर 
कहने वालो तुम पर धिक्कार है !
पैसठ बसंत तो बीत गए 
अब कितना इन्तेजार है ? 

मै हिंदुस्तान हु ! 

©  आदित्य श्रीवास्तव 



Friday, September 10, 2010

ये मशीन नहीं हमारे अपने लोग है...


दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन पर सुरक्षा जाँच के दौरान एक सी आई एस ऍफ़ के जवान से रूबरू हुआ। एस्कैन मशीन जो एक मशीन होने के नाते ख़राब हो गया था जो मशीनो की फितरत में शुमार है। कर्तव्यपरायण सिपाही तुरंत खुदसे सामानों की जांच करने लगे मानो देश पे आक्रमण हो गया हो। परेसान होना तो लाजिमी था। सामने से एक कपल जा रहा था। लड़की बेहद खुबसूरत थी। तराशा हुआ भरा पूरा शारीर तीखे नैन नक्श सबको अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे। लाल रंग के टी शर्ट और स्टोन वाश कलर का जींस उस मोहतरमा पर खूब फब रहा था। जो भी उस लड़की को देखता कुछ देर खो जाता उसे ऊपर से निचे तक निहार लेता। ऐसी खुबसूरत मॉडल टाइप की गर्लफ्रेंड को पाकरउसका बॉय फ्रेंड बड़ा प्राउड फील कर रहा था जो उसके चेहरे से झलक रहा था. । मैंने भी एकबार देखा। फिर सिपाही की तरफ देखा। हमारी आँखों ही आँखों में बात हो गयी। सिपाही मुस्कुराने लगा। तभी एक आदमी जिसका बैग वो सिपाही चेक कर रहा था ने डाटते बोला - अरे बैग चेक करो और सुरक्षा जांच पर ध्यान दो, ड्यूटी करना छोर लड़की देख रहे हो ? सिपाही के चेहरे पर गुस्सा स्पष्ट झलक रहा था पर वो कुछ कह नहीं पाया। फिर वो आदमी चला गया। जब मेरी बारी आई तो मैंने सिपाही से बोला - अब तो हुस्न को देखना भी गुनाह हो गया जनाब क्यों ? इसपर सिपाही और उसका सिनिअर मुस्कुराने लगे। सिपाही ने कहा - यार हम भी इंसान है मशीन नहीं ! मैंने कहा - साहब आप लोग पर ही तो हमारी सुरक्षा टिकी है कुछ पागल टाइप के भी लोग होते है आप उनकी बात को दिल से मत लीजिये। मुझे सिपाही की बात दिल को लग गयी। हम खुलेआम घूमते फिरते है फिल्म देखते है बाजार जाते है और जब मर्जी हो छुट्टी भी कर लेते है, अपने परिवार वालो के साथ कही सैर करने चले जाते है, बच्चो के साथ पिकनिक पर जाते है यानी अपनी स्वतंत्रता का भरपूर रसास्वादन करते है। दूसरी तरफ ये सिपाही पुरे ड्यूटी के दौरान एकदम सतर्क होकर हमारी और देश के सुरक्षा के लिए पूरी तत्परता से सेवा करते है। स्वतंत्रता दिवस, दिवाली, होली, ईद और यहाँ तक की रविवार को भी ये लोग ड्यूटी देते है। क्या हमारा फर्ज नहीं की कम से कम इन्हें मशीन नहीं इन्सान समझा जाये ? ड्यूटी के दौरान इनको सहयोग देने के साथ ही साथ दोस्तों की तरह बर्ताव की जाए। और कुछ नहीं तो कम से कम थैंक्स तो बोल ही सकते है। अपने परिवार से बहुत दूर अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाले इन सिपाहीओ के लिए हम ही तो इनकी फॅमिली और दोस्त है। ये हमारे अपने लोग है।

Monday, September 6, 2010

वोमिटिंग करना है तो देखिये फिल्म 'हेल्लो डार्लिंग'


यह एक ऐतिहासिक फिल्म थी मेरी जिंदगी के लिए...निकृष्ट फिल्म बनाने की कला का सर्वोत्कृष्ट उदहारण...दर्शको को बोर करने की पराकाष्टा....पैसे को अगर नाली में फेक देते तो भी एक सार्थक काम होता. शायद... किसी को मिल जाये और वो उसके काम आ जाये...पर इस फिल्म को देखने में खर्च किये पैसे के लिए मै अपने आप को कभी माफ़ नहीं करूँगा. इससे पहले भी एक फिल्म आई थी - कमल हसन की 'दशावतार'. ऐसे महान फिल्म निर्माताओ और मूर्घन्य पटकथाकारो से मेरा विनम्र निवेदन है की कृपया आप ऐसे फिल्म बनाने के पीछे अपनी अद्भुत मंशा को जगजाहिर करे. हेल्लो डार्लिंग की बात करे तो फिल्म किस विषय पर था...उस सत्य का छिद्रान्वेषण तो शायद मशहूर जासूशी कथा लेखक अर्थेर कानन डायल भी नहीं बता सकते. दिलकश अदाकारा ईशा कोप्पिकर की अचंभित करने वाले डाएलोग डेलिवरी का तो मै कायल हो गया ! किसी को भी आकर्षित कर सकने वाले खुबसूरत सुडौल बॉडी पर अत्याधुनिक वस्त्रो को धारण किये ये अप्सरा ठेठ हरयाणवी बोलती है ...सुना आपने ? हरयाणवी ! शायद आपको हाजमोला की जरुरत हो. सेलिना जेटली और गुलपनाग के बारे में कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि फिल्म में उनके साथ उनका बॉस शोषण करता है पर मुझे तो ये वास्तविक घटना लगाती है. गुल पनाग ने इस फिल्म को क्यों चुना मुझे समझ में नहीं आया. यह फिल्म उसके करियर के लिए एक दाग है. गुलपनाग की फिल्म देखि थी - धुप. क्या मस्त फिल्म थी और लाजवाब एक्टिंग अपर इस फिल्म में उसके साथ इन्साफ नहीं हुआ. अगर जावेद जाफरी जिन्हें अब हीरो बनने
का शौक चढ़ा है...कही मिल जाए तो फिर यह जरुर शाबित कर दूंगा की 'इंसान भी कभी जानवर था ' ऐसे मानसिक शोषण करने वाले फिल्म निर्माताओ को बॉलीवुड से बहिस्कृत कर देना चाहिए.